Kuch Kehna Chahti Hai Humse

कुछ कहना चाहती है, हमसे

प्रकृति
कुछ कहना चाहती है, हमसे

इन पत्तों का झूमना
ये हवाओं का चलना
पेड़ों पर फुदकते चिड़ियों का शोर
कुछ कहना चाहती है, हमसे

बारिश में नाचते मोर
बसंत में गाती हुई कोयल
ये समुन्द्र की लहरों का शोर
कुछ कहना चाहती है,हमसे

दिन में सूरज की चिलचिलाती धूप
और चांद की ये चांदनी
इन तारों की टिमटिमाती हुई झुंड
और खिले हुए सुंदर रंग – बिरंगे फूल
कुछ कहना चाहती है,हमसे

किचड़ में कमल का खिल जाना
बारिश में इन्द्रधनुष का निकल आना
नदियों की धीमी रफ्तार
और इन उड़ते बादलों की टकरार
कुछ कहना चाहती है,हमसे

जंगल में शेरो की दहार
पानी में तैरती मछली की फुफकार
भोड़ों का यू गुनगुनाना
तितली का यू मंडराना
कुछ कहना चाहती है,हमसे

ये पहाड़ों की ऊंची से चोटी
और नीचे बहती हुई घाटी
ये बहती हुई झरना
ये ज्वालामुख का फूटना
कुछ कहना चाहती है,हमसे

ये काली घटाओ का पहरा
और भोजन पानी का मिल जाना
हमारी जरूरतों को पूरा करना
कुछ कहना चाहती है,हमसे

प्रकृति को मां का स्वरूप देना
जीवनदायनी कहलाना
और अपने आंचल में हमें समेट कर रखना
सचमुच प्रकृति हमारी मां है
और ये कुछ कहना चाहती है,हमसे।।

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