Kaash Zindagi Sachmuch Kitaab Hoti

काश ज़िन्दगी सचमुच किताब होती

_काश, ज़िन्दगी सचमुच किताब होती…
काश, मै पढ़ सकती आगे क्या होगा?
क्या मुझे पाना है,क्या खोना है…
कब खुशियां मिलेगी,कब रोना है…
फाड़ देती हर उस पन्ने को जिसने मुझे रुलाया…
लिख देती उन यादों को जिसने मुझे हसाया…
समय से नजरे चुरा कर पीछे चली जाती…
फिर से बिखरे सपनों को सजाती…
काश, ज़िन्दगी सचमुच किताब होती…
वैसे ज़िन्दगी बड़ी अजीब सी है, न?
जो सोचो वो मिलता नहीं, जो मिलता वो पसंद आता नहीं….
जो खो गया वो याद आता है,और जो पाई संभलता नहीं….
ज़िन्दगी हमे कितना कुछ सिखाती है, न?
गिरना,उठना,उठ चलना सजा देती उसके हर पन्नों को रंग – बिरंगे रंगो से….
काश ज़िन्दगी सचमुच किताब होती…..
काश ज़िन्दगी सचमुच किताब होती।।_

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